धर्मशंकट को कैसे सुलझाए। भगवद गीता से।

हेलो फ्रेंड्स आज में आप लोगों को भगवद गीता पढ़ने से हम अपनी उल्ज़नो को सुलझा सकते है। उसके बारे में बताने जा रहा हु।

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भगवद गीता को कृष्ण भगवानने अर्जुन को वृन्दावन में नहीं परंतु कुरुक्षेत्र में सुनाई थी। अर्जुन अपने कर्तव्य का मार्ग नहीं देख पा रहा था। और अपने आपको धर्म शंकट में हो ऐसा महसूस कर रहा था। वो निर्णय नहीं ले पा रहा था, की सही क्या है और गलत क्या है। तब अर्जुन, श्री कृष्ण भगवान् को कहते है। की आप मेरा मार्गदर्शन कीजिये। मुझे मेरा मार्ग ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है, आप मुझे मेरा मार्ग दिखाइएमेरा कर्तव्य क्या है वो मुझे आप बताइये। तब श्री कृष्ण भगवानने अर्जुन के सवालो के जवाब दिए। अर्जुन सवाल करता है और श्री कृष्णा भगवान् उसका जवाब देता है। इन दोनों का संवाद काफी अद्भुत है। दोनों के संवाद की बात भगवद गीता में लिखी है। अर्जुनने जितनेभी सवाल कृष्ण भगवान से किये थे, वैसे ही सवाल हमारे सबके मनमे पैदा होते है, जिनके जवाब हमें ना मिल पाने की वजह से हम भी हमारे जीवन में उदास रहते है। पर अब हमें हमारे जवाब इस भगवद गीता से मिलेंगे। भगवद गीता को आप Amazon से भी मंगवा सकते हो। आप अपनी भाषा में भी मंगवा सकते हो।
हिंदी में      |  Gujarati    |   Marathi    |     English   इन में से जो भाषा पसंद हो उस भाषा की भगवद गीता मंगवाइये। मंगवाने के बाद उसे पढ़िए। ये भगवद गीता की बुक पढ़ने के बाद आपको दुनिया की साड़ी किताबे भगवद गीता के सामने फीकी नजर आने लगेगी।


भगवद गीता से मुलभुत ज्ञान (Fundamental) :


भगवद गीता से Basic ज्ञान प्राप्त होता है। जिससे हम अपने प्रॉब्लम को हल कर सकते है। भगवद गीता बहुत बड़ी है पर में यहाँ आप लोगों को कुछ कुछ इम्पोर्टेन्ट बाते ही बताने वाला हु। जब कुरुक्षेत्र में युद्ध  शुरु होने वाला था, पांडव और कौरवो की शेनाये एक दूसरे के सामने खड़ी थी तब अर्जुन कृष्ण को कहते है, है कृष्ण जरा इस रथ को इन दो शेनाओ के बिच में ले जा कर खड़ा करो। कृष्ण रथ को सेना के बिच में ले जाकर रखते है। कृष्ण अर्जुन का रथ चलाते है। कृष्ण भगवानने इस युद्ध में शस्त्र न उठाने का वचन लिया था। ये युद्ध 18 दिनों तक चला था। अगर कृष्ण भगवन सस्त्र उठा लेते तो सायद बहुत ही कम दिनों में युद्ध समाप्त हो गया होता। ये युद्ध पांडवों और कौरवों दोनों भाईओ के बिच था। इसलिए कृष्ण भगवानने सोचा होगा की, में इस युद्ध में अर्जुन का रथ चलाकर अर्जुन का सारथि बनूँगा। अर्जुन कहते है, है कृष्ण आप रथ को दोनों सेनाओ के बिच लेजाकर खड़ा करो, कृष्ण रथ को दोनों सेनाओ के बिच ले जाकर रखते है। तब अर्जुन दोनों सेनाओ को देखते है, उसमे अपने भाईओ, सगे सबंधीओ को देखकर शोक में दुब जाते है। और उदास हो जाते है। और कृष्ण को कहने लगते है, में ये युद्ध नहीं लड़ सकता। "में इस युद्ध में जीता तो भी हारा, और में हारा तो भी हारा, जब हारा ही हारा तो में ये युद्ध क्यों कर, में ये युद्ध क्यों करू।" ऐसा बोलकर वो रोने लग जाते है। और अपना धनुष निचे रख देते है, और बोलने लगते है, में ये युद्ध नहीं लड़ सकता। अर्जुन की आँखों में आंसूं आ गए होते है। की में मेरे अपनो को कैसे मार सकता हु। वो तो मेरे अपने है। ये सब सोच कर अर्जुन बैठ जाते है हिम्मत हार कर। तब कृष्ण भगवान् बोलते है। अपनी हृदय की इस दुर्बलता को त्यागो और युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। उठो अर्जुन उठो। अर्जुनने कहा खड़ा कैसे हो जाऊ। अपने सगे सम्बंधिओ का वध करने के लिए खड़ा कैसे हो जाऊ। अर्जुन ने कहा क्या वो मेरे सगे संबंधी नहीं है। कृष्णने कहा हां है, ये युद्ध अपने संबधो की पहचान करने के लिए नहीं है। अपने कर्तव्य को पहचानो और फिर निर्णय लो। अर्जुन इतना दुखी हो गया था की सही निर्णय नहीं ले पा रहा था। कृष्णा कहते है, ये युद्ध भी तुम्हारा है और इसका निर्णय भी तुम्हे ही लेना है। और इसका जो परिणाम होगा वो भी तुम्हारा ही है। तो अर्जुन कहते है, में निर्णय नहीं ले पा रहा हु। आप मेरे मार्ग दर्शक बन जाईये। अर्जुन ने कहा मेरा कर्तव्य क्या है। कृष्णने कहा, की तुम कौन हो। अर्जुन कहते है, कुंती पुत्र अर्जुन हु, में द्रोण शिष्य हु, और में क्षत्रिय हु। कृष्णा कहते है, की तुम क्षत्रिय हो। क्षत्रिय का धर्म होता है युद्ध करना। इसलिए युद्ध करना ही तुम्हारा कर्तव्य है। अर्जुनने कहा में जानता हु। लेकिन में अपने आपको धर्म शंकट में हु ऐसा महसूस कर रहा हु। और में ये निर्णय नहीं ले पा रहा हु, की धर्म किस और है और अधर्म किस और। ऐसी परिश्थिति में अर्जुन बहुत उदास हो जाते है। और कहने लगते है, की में युद्ध नही कर सकूंगा।

कृष्ण कहते है, ग्यानी पुरुष कभी शोक में नहीं डूबा करते है। जो चले गए है, उनका शोक करते है और न चले गये का शोक करते है। जो लोग मर जाते है वो फिरसे जन्म ही लेंगे।  फिर शोक किस बात का। आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में चली जाती है, जैसे हम कोई पुराना वस्त्र उतार कर कोई नया वस्त्र पहन लेते है। आत्मा की यात्रा तो अनंत है पार्थ। शरीर अमर नहीं होते है, आत्मा अमर होता है। शरीर तो त्याग करने के लिए ही होता है। जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु तो निश्चित ही है। प्राणी जन्म लेने के बाद, बालक होता है, फिर युवा, फिर वृद्धा, फिर मृत्यु। जन्म लेने वाले को मरना ही पड़ता है। फिरभी आत्मा नहीं मरता। वो अपनी एक यात्रा पूरी करके दूसरी यात्रा शुरू कर देता है। इसलिए अर्जुन शोक न करो।


स्थित प्रग्य

जो सुख और दुःख को समान समझता है। और उनसे प्रभावित हुए बिना ही उन्हें झेल जाए वही स्थित प्रग्य है। और वही मोक्ष का अधिकारी है। आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि उसे जला नहीं सकती, पानी उसे भीगा नहीं सकती और वायु उसे सूखा नहीं सकती।

कृष्ण अर्जुन से कहते है, लाभ और हानि, सुख और दुःख सबको समान समझो और युद्ध करो। इस युद्ध में तुम्हारी मृत्यु हुई तो तुम्हे स्वर्ग मिलेगा। और जित मिलेगी तो राज्य मिलेगा। अगर तुम इस युद्ध में भाग नहीं लोगे तो लोग तुम्हे युद्ध से डरा हुआ, कामी पुरुष कहेंगे, लोग तुम्हारे लिए बहुत ही बुरा बोलेंगे, जिससे तुम्हे मृत्यु से भी बढकर दुःख होगा। इसलिए युद्ध करना तुम्हारे लिए सही रास्ता है। तुम्हे लाभ हानि, जय पराजय, सुख और दुःख से ऊपर उठाना होगा। अर्जुन कहते है, में अभीभी ऊपर नहीं उठ सकता हु।

कृष्ण अर्जुन से कहते है, इस युद्ध में तुम्हे भाग लेना बहुत ही जरुरी है। अर्जुन कहते है, में इस युद्ध में भाग लेनेका निर्णय नहीं ले पा रहा हु। कृष्णने कहा तुम मोह की दृस्टि से देख रहे हो इसलिए तुम निर्णय नहीं ले पा रहे हो। इस युद्ध में भाग न लेना तुम्हारे लिए लाभ दायी है, और नाही समाज के लिए लाभ दायी है।


भगवद गीता पढ़ने से हमें कैसे फायदा होगा।

भगवद गीता पढ़ने से हमें मूल ज्ञान प्राप्त होगा। जिससे हमारा मन मजबूत होगा। और हम सही और गलत निर्णय पहचान पाएंगे। और सही निर्णय ले पाएंगे। जब हम निर्णय ले पाएंगे तभी हमारे मन का, हमारे जीवन के उल्ज़नो का पहला स्टेप पूरा होगा। जब हम निर्णय ले पाएंगे तभी हम उस कार्यो को पूरा करने के लिए कदम बढ़ाएंगे।
  • हम ठोकर खाते है तब, हमें लोग देखे तो कोई बात नहीं, पर हमें वहाँ पे ठहरा हुवा नहीं देख पाने चाहिए।

द्रोणाचार्य ने और कृष्ण ने अर्जुन को क्या शिखाया।

द्रोणाचार्य ने अर्जुन को धनुर्विद्या और युद्ध कैसे करने की शिक्षा दी। और कृष्ण ने  अर्जुन को मन से मजबूत किया युद्ध भूमिमे।
द्रोणाचार्य ने युद्ध करने की कला शिखाई। कृष्ण ने Attitude Build करना शिखाया।
द्रोणाचार्य ने Occupational Duty शिखाया। कृष्ण ने Constitutional Duty शिखाया।
द्रोणाचार्य ने पांडवो को युद्ध में क्या कब करना, कैसे करना, क्यों करना किस तरह करना शिखाया था। कृष्ण ने अर्जुन की इच्छा शक्ति को जागृत किया।

भगवद गीता कालातीत ज्ञान है। (Timeless Wisdom)

मतलब हर समय में हमें मदद करनेवाला ज्ञान है। मतलब भगवद गीता का ज्ञान हर युग में, हर परिस्थिति में, हर समय में, पूरी दुनिया में, पुरे ब्रह्माण्ड में, हर व्यक्ति की हरेक समस्या में उसे मदद करने वाला ज्ञान है। भगवद गीता का ज्ञान हमें हर प्रॉब्लम में मदद करेगा।

भगवद गीता में जीवन कैसे जिनेका तरीका है। (How to live life in Bhagavad Gita, Instruction Manual)

हम सब कृष्णा भगवन को मानते है। मतलब कृष्णा भगवान की कही हुई बातों को मानते है। जैसे हम कोई भी चीज खरीदते है, तो उसके साथ हमें एक इंस्ट्रक्शन मैन्युअल मिलता है, क्यों की उस मैन्युअल के हिसाब से हम चलाएंगे तो वो बहुत ही अच्छी तरह और ज्यादा से ज्यादा समय तक अच्छे से चलेगा। वैसी ही भगवद गीता सभी जीवो का मैन्युअल है, हमारा सब का मैन्युअल भगवद गीता है, इस मैन्युअल के हिसाब से हम जीवन जियेंगे तो हम अच्छी तरह जी सकेंगे।


भगवद गीता के पहले अद्ध्याय में क्या हुआ था।

पहले अद्ध्याय में अर्जुन बोलते रहे, और कृष्ण सिर्फ सुनते रहे। अर्जुन ने कहा में अपने स्वजनों को मारकर मुझे वो सिंघासन नहीं चाहिए। में भिक्षा मांग कर जी लूंगा, पर युद्ध नहीं करूँगा। इस तरह अर्जुन बोलते रहे और कृष्ण सुनते रहे। अर्जुन इतना दुखी हो गया था की, वो अपना धनुष निचे रखकर रोने लग गया था। जब अर्जुन बोल बोल कर थक गया तब बैठ जाते है, कृष्ण भगवान इसलिए सब सुन रहे थे, और सिर्फ अर्जुन को बोलने दे रहे थे, क्यों की कृष्ण अर्जुन के मनकी दशा समज रहे थे, कृष्ण अर्जुन की मन और बॉडी लैंग्वेज को समज रहे थे, कृष्ण जानते थे अगर में बिच में बोलूंगा तो डिस्टर्ब हो जाएगा, इसलिए कृष्ण सब सुनते रहे और उसे समजते रहे।  । उसीमे भगवद गीता का पहला अद्ध्याय पूरा होता है।  फिर दूसरा अद्ध्याय शुरू होता है, उसमे कृष्ण भगवान बोलते है : है, अर्जुन अपने मनकी दुर्बलता को त्याग करके, युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। तुम्हार इस तरह शोक में डूबना उचित नहीं है। इस तरह हमेभी हमारे जीवन में अपने भी धर्मशंकट होते है, हम लोग भी कुछ यादो को लेकर शोक दुबे रहते है। हमारी वजह से किसी को नुकशान होगा। ये सोच कर हम भी शोक में दुब जाते है, पर हमें ऊपर उठना है। जब हम भगवद गीता पढ़ेंगे तब हमें अपना कर्तव्य दिखाई देगा और तब हमारा मन जागृत होगा। जैसे कृष्ण भगवानने अर्जुन को जागृत किया, उसी प्रकार भगवद गीता से हमारा मन जागृत हो जाएगा।

भगवद गीता में कितने अद्ध्याय और कितने श्लोक है।

में आपको बता देता हु, भगवद गीता में अठ्ठारा अद्ध्याय है। और भगवद गीता में 700 श्लोक है।

भगवद गीता के सभी अद्ध्याय के नाम बताये।

1. अध्याय पेहला में कुरुक्षेत्रकी रण भूमि पे सैन्य देखना।
2. अध्याय दूसरा  में गीता का सार।
3. अध्याय तीसरा इस अद्ध्याय में कर्मयोग के बारे में बताया गया है।
4. अध्याय चौथा इस अद्ध्याय में दिव्य ज्ञान योग के बारे में।
5. अध्याय पांचवा इस अद्ध्याय में कर्मयोग के बारे में।
6. अध्याय छठ्ठा इस अद्ध्याय में ध्यानयोग के बारेमे।
7. अध्याय सातवां इस अद्ध्याय में परमेश्वर का ज्ञान के बारेमे। 
8. अध्याय आठवां इस अद्ध्याय में भगवत्प्राप्ति के बारेमे।
9. अध्याय नौवां इस अद्ध्याय में परम गुह्य ज्ञान के बारेमे।
10. अध्याय दसवां इस अद्ध्याय में परमेश्वर का ज्ञान के बारेमे।
11. अध्याय ग्यारहवां इस अद्ध्याय में विश्वरूप का दर्शन के बारेमे।
12. अध्याय बारहवां इस अद्ध्याय में भक्तियोग के बारेमे।
13. अध्याय तेरहवां इस अद्ध्याय में प्रकृति, पुरुष और चेतना के बारेमे।
14. अध्याय चौदहवां इस अद्ध्याय में प्रकृतिके तीन गुण के बारेमे।
15. अध्याय पन्द्रवा इस अद्ध्याय में पुरुषोत्तम योग के बारेमे।
16. अध्याय सोलहवां इस अद्ध्याय में दैवी और आसुरी प्रकृति के बारेमे।
17. अध्याय सत्रः इस अद्ध्याय में श्रद्धा के विभाग के बारेमे।
18. अध्याय अठारह इस अद्ध्याय में उपसंहार - त्याग की पूर्णता के बारेमे बताया गया है।

सच्चा ज्ञान तो आप लोगों को भगवद गीता से ही मिलेगा, में तो बस भगवद गीता के बारे में थोड़ा - थोड़ा बता  बताया है। भगवद गीता पढ़ने के बाद ही हम सही और गलत का निर्णय ले पाएंगे और हम हमारे धर्मशंकट को दूर कर पाएंगे।
इस तरह बहुत अच्छा ज्ञान है, भगवद गीता में तो आप लोग इस बुक को खरीद कर पढ़िए। पोस्ट अच्छी हो इसे सोशल मीडिया पर शेयर जरूर करे।

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